Friday, 6 January 2012

आवा-जाही

आप कई दिनों से यहाँ आ कर यु ही लौट जाते हैं शायद पुराने पन्ने खोजने मुश्किल हो गए हैं इन रोजमर्रा की ढेरों से, पर यहाँ से लौटते हुए एक खामोश सी मुस्कान जो होठों पे खिल जाती है..बड़ी प्यारी लगती है.
याद  है, जब एक पेंसिल और कागज के टुकड़े पे घंटो कट जाया करते थे, किसी सफ्हे पर अटक कर नींद आ जाती थी और खाबों की टहनियों से उतरते हुए कवितायेँ  पूरी भी हो जाती थी. कई दिनों तक नयी रचनाये बुशर्ट की जेब में मन के बिलकुल करीब और इन्हें गुनगुनाते होठ न जाने कौन सी उर्जा देते थे, कि अपनी बेरोजगारी एक वरदान लगती थी.
पाटलिपुत्र की असूर्यम्पश्य संकरी गलियां और ढलती शामों में कच्ची पक्की सड़के नापना आज भी सबसे हसीं यादों में से एक है, आज बड़ा मन कर रहा है दौड़ कर लौट जाऊं वही जहा लिखना छुट गया था, इसी कोशिश में ये ब्लॉग रजिस्टर किया शायद वो छुटा हुवा शिरा मिल जाये और बुन सकूँ कुछ नए ताने बाने.
              आभार .....रंजन

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