Friday, 6 January 2012

गीत

टुकड़ों की खनक अब है हममें.
.धड़कन की तरह सासों की तरह..
सब मुझको झूठे लगते हैं
 क्यों तेरे हसीं वादों की तरह....

मैं तुमको भूल न पाऊँगा
ये सच है माना अपने लिए
पर तेरे शहर में आऊंगा
कुछ भूली हुई यादो की तरह..

हमने तो सजाया घर अपना
 गुलशन के प्यारे फूलों से
बस आख खुली और बिखर गए,
हम अपने इन्ही खाबों की तरह...

एक शोर हमारे भीतर भी
 उठती है मगर दब जाती है
 हम झुक कर माँगा करते हैं
 तुम्हे अब भी फरियादों की तरह...

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